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परंपरा की समीक्षा

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उद्देश्य की बात करने से पहले प्रेमचंद का दृष्टिकोण जानना आवश्यक है। लाहौर के मासिक-पत्र ‘नौरंगे ख्याल’ के संपादक से उन्होंने कहा था- “मेरी कहानियाँ प्रायः किसी न किसी प्रेरणा या अनुभव पर आधारित होती हैं। इसमे मैं नाटकीय रंग भरने की कोशिश करता हूँ। मैं कहानी में किसी दार्शनिक या भावात्मक लक्ष्य को दिखाना चाहता हूँ। जब तक इस प्रकार का कोई आधार नहीं होता, मेरी कलम नहीं उठती।“

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जिहाद वैसे भी स्पष्ट रूप से एक सोद्देश्य कहानी दिखाई पड़ती है। जहाँ न सिर्फ प्रेमचंद मृत्यु को धर्मांतरण से उच्च स्थान देकर हिन्दू समाज में उत्साह भरने का कार्य कर रहे हैं। श्यामा और खजानचंद के वाक्यों से हिन्दू जीवन मूल्यों को स्थापित कर रहे हैं। साथ ही जिहाद, कुफ्र, ईमान, जन्नत, हूर, फरिस्ते, सवाब आदि शब्दों मे निहित घृणा को भी उजागर कर रहे हैं। प्रेमचंद उद्घोष करते हैं कि ’ हिंदू को अपने ईश्वर तक पहुंचने के लिए किसी नबी, वली या पैगम्बर की जरूरत नहीं! ’

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दूसरा विकल्प यह हो सकता था कि खजानचंद की मृत्यु के बाद श्यामा की धर्मपरायणता देखकर हिंदुओं के रक्त में उबाल आता और धर्मदास व अन्य लोग मिलकर पठानों को मार गिराते।

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‘सद्गति’ कहानी में ब्राह्मणों के एक शोषक भाग की निष्ठुरता का उद्घाटन करने की राह में समस्त ब्राह्मणों को शोषक-समाज के रंग से रंगने वाली उनकी लेखनी जिहादियों की बर्बरता, उन्माद और आतताई प्रवृत्ति की नग्नता प्रदर्शित करने में तनिक कुंठित होती दिखाई देती है।

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यदि पिछले महीने मे काबुल के गुरुद्वारे में बम से मारे गए सिखों की चीत्कार सुने तो पता चलता है आज भी वातावरण वैसा ही है। जहां गुरुद्वारे में मारे गए लोगों का अंतिम संस्कार कर रहे परिजनों को भी बम से हमला कर के मार दिया जाता है।

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फिर भी सदैव ‘पंच परमेश्वर’ जैसे सांप्रदायिक सौहार्द के मंत्र को ही प्रसारित करने वाले मुंशीजी की ‘जिहाद’ की विशेषता यही है कि इस कहानी में उन्होंने इस्लामिक कट्टरता के नग्न यथार्थ को निर्दयता से प्रकाशित किया है। (वर्तमान में ट्विटर की भाषा में कहें तो वह राहुल ईश्वर की कृत्रिमता से निकलकर राहुल रौशन की वास्तविकता को गृहण कर रहे हैं।)

भारत में हर कोई लगभग दस-बारह वर्ष की आयु तक मुंशी प्रेमचंद की कोई न कोई कहानी अवश्य पढ़ चुका होता है। जो प्रदेश हिन्दी भाषाभाषी नहीं हैं वहाँ भी अनुवाद के माध्यम से प्रेमचंद कहानी की दुनिया में प्रवेश कर ही जाते हैं। मुंशीजी की मृत्यु 6986 में हुई। अपने जीवनकल में उन्होंने लगभग तीन सौ कहानियों से हिन्दी साहित्य को विभूषित किया। परंतु यहाँ चर्चा मुंशी प्रेमचंद की उस कहानी की करेंगे जो लोगों की पहुँच से दूर रखी जाती है। कहानी का नाम है-‘जिहाद’। यदि पाठकों ने कहानी न पढ़ी हो तो समीक्षा पढ़ने से पूर्व चार-पाँच मिनट मे लिंक में दी हुई कहानी पढ़ लें अन्यथा कहानी के बिना समीक्षा का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

काफिरों की हत्या को जन्नत का मार्ग और काफिरों की महिलाओं को ‘माल-ए-गनीमत’ का हिस्सा मानने वाले तथा हूरों से संसर्ग की चाह में अंधे जिहादियों से ऐसी अपेक्षा किसी भी जानकार व्यक्ति के गले नहीं उतरती। कश्मीर में गिरिजा टिक्कू के साथ हुई क्रूरता से लेकर इस्लामिक स्टेट के आतंकियों द्वारा यजीदी बच्चियों के साथ दिन में पचास-पचास बार की गई जघन्यता जैसे लाखों उदाहरण इतिहास में बिखरे पड़े हैं।

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किन्तु विडम्बना यह है कि मृत स्वरूपा रूढ़ियों को भी बुराई भलाई के डर के कारण मनुष्य परंपरा मानकर अनिच्छा पूर्वक ही सही किन्तु ढोये जाता है और यह अन्य मनस्कता की चिंगारी ही धीरे धीरे विद्रोह में तबदील हो जाती है और नई पीढ़ी इन मृत हो चुकी परम्पराओ को (जिन्हें मैं रूढ़ी ही कहूँगा) त्याग देती है, अनुगमन नहीं करती है।

न जाने कितने खजानचंदों की हत्याएं निरंतर होती रही हैं। वास्तविक श्यामाएं या तो अपमान के नारकीय जीवन को विवश हुई है या जौहर व्रत का पालन करने को। धर्मदास अपना धर्मत्याग अरबी नाम धारण कर के पठान की भूमिका आ रहे हैं। अपनी कुंठा और हीनभावना को छिपाने के लिए वो अब बचे हुए काफिरों को भी अपने जैसा कुंठित बनाने में लगे हुए हैं।

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