आजीवन हिन्दू रहे गौतम बुद्ध! - | प्रवक्‍ता.कॉम

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एकीकृत अखिल नेपाल जनसांस्कृतिक महासङ्घ: January 2014

अतः ऐतिहासिक तथ्य यह है कि हिन्दू समाज से अलग कोई अ-हिन्दू बौद्ध समाज भारत में कभी नहीं रहा। अधिकांश हिन्दू विविध देवी-देवताओं की उपासना करते रहे हैं। उसी में कभी किसी को जोड़ते, हटाते भी रहे हैं। जैसे, आज किसी-किसी हिन्दू के घर में रामकृष्ण, श्रीअरविन्द या डॉ. अंबेदकर भी उसी पंक्ति में मिल जाएंगे जहाँ शिव-पार्वती या राम, दुर्गा, आदि विराजमान रहते हैं। गौतम बुद्ध, संत कबीर या गुरू नानक के उपासक उसी प्रकार के थे। वे अलग से कोई बौद्ध या सिख लोग नहीं थे।

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वेलेंटाइन डे (दिवस), जिस पर आधुनिक जोड़े अंतरजातिय, अंतरधार्मिक शादी के बंधनों में स्वेच्छा से बंधते हैं, उन पर हमले व हत्या करवाकर पितृसत्तात्मक मूल्यों को बचाने की कोशिश की जा रही है. शिक्षा का भगवाकरण तथा भूतकाल को झूठलाते हुए रामायण, महाभारत के मनगढ़ंत किस्म के आधार पर बच्चे के भोले-भाले दिमाग को जहरीला बनाकर प्रगतिशील उदारवादी समूहों, जाति प्रथा विरोधी संगठनों, छात्रों और बुद्धिजीवियों को निर्दयी पंजों से दबाने की कोशिश किया जा रहा है.

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लेकिन यदि गौतम बुद्ध के जीवन, विचार और कार्यों पर संपूर्ण दृष्टि डालें, तो उन के जीवन में एक भी प्रसंग नहीं कि उन्होंने वंश और जाति-व्यवहार की अवहेलना करने को कहा हो। उलटे, जब उन के मित्रों या अनुयायों के बीच दुविधा के प्रसंग आए, तो बुद्ध ने स्पष्ट रूप से पहले से चली आ रही रीतियों का सम्मान करने को कहा।

हमारे अनेक बुद्धिजीवी एक भ्रांति के शिकार हैं, जो समझते हैं कि गौतम बुद्ध के साथ भारत में कोई नया ‘धर्म’ आरंभ हुआ। तथा यह पूर्ववर्ती हिन्दू धर्म के विरुद्ध ‘विद्रोह’ था। यह पूरी तरह कपोल-कल्पना है कि बुद्ध ने जाति-भेदों को तोड़ डाला, और किसी समता-मूलक दर्शन या समाज की स्थापना की। कुछ वामपंथी लेखकों ने तो बुद्ध को मानो कार्ल मार्क्स का पूर्व-रूप जैसा दिखाने का यत्न किया है। मानो वर्ग-विहीन समाज बनाने का विचार बुद्ध से ही शुरू हुआ देखा जा सकता है, आदि।

बिलकुल सही कहा। बुद्ध सनातन धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने कोई अलग धर्म नहीं बनाया था। उनके शिष्यों ने बनाया होगा अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए

मूलत: जमालपुर, बिहार के रहनेवाले। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 8766 मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन 8767 जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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